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Saturday, November 29, 2008

हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..

लेखक - अकबर एलाहबादी


हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..
डाका तो नहीं डाला.. चोरी तो नहीं की है..
उस मे से नही मतलब.. दिल जिस से है बेगाना..
मकसुद है उस मे से.. दिल ही मे जो खिंचती है..
सूरज में लगे धब्बा.. कुदरत के करिश्में हैं..
बुत हमको कहें काफ़िर.. अल्लाह की मर्ज़ी है..
ना तजुर्बाकारी से वाईज़ की ये बातें हैं..
इस रंग को क्या जाने.. पूछो तो कभी पी है..
वा दिल में की सदमे दो.. या की मे के सब सह लो..
उनका भी अजब दिल है.. मेरा भी अजब जी है..
हर ज़र्रा चमकता है.. अनवार-ए-इलाही से..
हर सांस ये कहती है.. हम हैं तो खुदाई है..
हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..
डाका तो नहीं डाला.. चोरी तो नहीं की है..
थोडी सी जो पी ली है..

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