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Saturday, November 29, 2008

हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..

लेखक - अकबर एलाहबादी


हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..
डाका तो नहीं डाला.. चोरी तो नहीं की है..
उस मे से नही मतलब.. दिल जिस से है बेगाना..
मकसुद है उस मे से.. दिल ही मे जो खिंचती है..
सूरज में लगे धब्बा.. कुदरत के करिश्में हैं..
बुत हमको कहें काफ़िर.. अल्लाह की मर्ज़ी है..
ना तजुर्बाकारी से वाईज़ की ये बातें हैं..
इस रंग को क्या जाने.. पूछो तो कभी पी है..
वा दिल में की सदमे दो.. या की मे के सब सह लो..
उनका भी अजब दिल है.. मेरा भी अजब जी है..
हर ज़र्रा चमकता है.. अनवार-ए-इलाही से..
हर सांस ये कहती है.. हम हैं तो खुदाई है..
हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..
डाका तो नहीं डाला.. चोरी तो नहीं की है..
थोडी सी जो पी ली है..

मेरे बारे में !!!

साँस लेते हुए भी डरता हूँ
ये न समझें कि आह करता हूँ

बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब
मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ

इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है
साँस लेता हूँ बात करता हूँ

शेख़ साहब खुदा से डरते हो
मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ

आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज
शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ

ये बड़ा ऐब मुझ में है 'यारो'
दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ

दिल मेरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला
बुत के बंदे तो मिले अल्लाह का बंदा न मिला

बज़्म-ए-याराँ से फिरी बाद-ए-बहारी मायूस
एक सर भी उसे आमादा-ए-सौदा न मिला

बज़्म-ए-याराँ=मित्रसभा; बाद-ए-बहारी=वासन्ती हवा; मायूस=निराश; आमादा-ए-सौदा=पागल होने को तैयार

गुल के ख्व़ाहाँ तो नज़र आए बहुत इत्रफ़रोश
तालिब-ए-ज़मज़म-ए-बुलबुल-ए-शैदा न मिला

ख्व़ाहाँ=चाहने वाले; इत्रफ़रोश=इत्र बेचने वाले;
तालिब-ए-ज़मज़म-ए-बुलबुल-ए-शैदा=फूलो

ं पर न्योछावर होने वाली बुलबुल के नग्मों का इच्छुक

वाह क्या राह दिखाई हमें मुर्शिद ने
कर दिया काबे को गुम और कलीसा न मिला

मुर्शिद=गु्रू; कलीसा=चर्च,गिरजाघर

सय्यद उठे तो गज़ट ले के तो लाखों लाए
शेख़ क़ुरान दिखाता फिरा पैसा न मिला


Thursday, November 27, 2008

ये कहा जा रहे है हम्?

काफी समय पहले ऍक गीत आया था " ये कहा गये हम यु साथ चलते२"

आज जमाना बदल गया
सुबह जब मै घर से ऑफिस के लिए निकला तो हर रोज की तरह धोबी कपडे धो रहा दुकानदार दुकान में धूपबत्ती दिखा रहा था बच्चे खेल रहे थे ! सब मिलाकर सिर्फ़ इतना कहना है की सब कुछ सामान्य दिख रहा था

लेकिन जब ट्रेन में बैठने गया तो जहा कभी खड़े होने की जगह नही रहती थी आज लोग शान से टांग फैलाकर सोते हुए नजर रहे थे मुझे ताज्जुब हुआ होना लाजिमी भी था !
मैंने एक बहुत ही अधेड़ टाइप के भाई साहब से पूछा तो उन्होंने हसते हुए जवाब दिया " अरे यार भला कभी तो सीट मिली जा बैठ इधर आज अपना मुंबई में बोम्ब ब्लास्ट हुआ है बस उसी का नतीजा है "
पर उसके कहने से मै एक बात का नोटिस किया की बंद जैसे किसी प्रशस्ति पत्र के मिलाने का कारन बता रहा हो अन्दर इतना गुमान था !
अब दुसरे तरफ़ देखिये १८-२० साल के लडके आपस में बात कर रहे है !
पहला -अबे बेन के ....... आज तो मैंने टिकेट ही नही लिया
दूसरा -अबे साले तुझे आज भी चैन नही है आज तो आखा फोर्स टी टी मुंबई में गयेला है तेरा टिकेट कौन चेक करेगा तेरा बाप्पू या तेरी ............

मै ये नही कहता की सोचते ही नही है आज देश की ये स्थिति है की सभी लोग खूब सोचते है पर क्या सोचते
है सिर्फ़ अपनी सलेरी बदने के बारे में अपने बच्चो के दाखिले के बारे में अपने माँ बाप के बारे नही अपने बहिन के बारे नही
ये सब तो छोड़ो अपने देश के बारे में भी नही
ख़ुद का बच्चा है तो उसके किए रेस्पेक्ट से बात करेगे और उसे अच्छी बाते बतायेगे और अगर उसी उमर का कोई गैर लड़का और थोड़ा गरीब या लाचार है तो उसके साथ गन्दी गन्दी मजाक करेगे और ये सभी कराने वाले एक अच्छे समाज में गिने जाते है
शर्म नही आती ऐसी ओची हरकते करते हुए।


बस अभी तो इतना हे लिखुगा आगे आप सब का आशीर्वाद रहेगा तो ...............................
पर समझ में नही आता ये कहा जा रहे हम ???????????